Thursday, September 3, 2015

मैथिली गजलक प्रति सकारात्मक होयबाक आवश्यकता


गजल कहब आइ कोनो नव गप्प नहि थिक, तखन  पहिले अरबी फेर फारसी आ उर्दूमे होयत रहैक आ आब  हिंदी , नेपाली , मैथिली , गुजराती , मराठी , बुन्देली , बंगाली सन-सन विभिन्न क्षेत्रीये भाषा आ बोलीमे सेहो  गजल कहब संभव भेल अछि ।

गजल बात कहबाक ढ़ंग (सलीका) सिखबैत अछि आ कमसँ- कम शब्दमे एकटा विशेष प्रकारक लयबद्धताक संग अपन बात प्रभावी ढ़ंगसँ कहब सिखबैत अछि । गजल रुप , रस , गंध , प्रेम , विरहके संग संग समाजक बहुत रास समस्याकेँ  प्रदर्शित करैत अछि , लोककेँ जीबाक ढ़ंग सिखबैत अछि । ई देशक चित्र देखबैत अछि ।
गजल एखन धरि धार्मिक मंचसँ चलि कऽ पीर मजार , राज दरबार , नबाबक मजलिससँ होयत चौबटिया धरि आयल अछि आ जन सामान्य धरि  पहुँचि रहल अछि ।


जौ एकर संरचना देखैत छी तऽ गजलमे दू तरहक संरचना भेटैत अछि - भीतरी आ बाहरी । जत' भीतरी संरचनामे बहर , रदीफ , काफियासँ लऽ कऽ शेरक बिम्ब धरिक  गप्प होयत अछि ओतै बाहरी संरचनामे शाइरक विचार , कल्पना आर सोच सोझाँ  आबैत अछि ।


एखन मैथिली गजल किछु नव व्याकरण (अरुज)केँ  जन्म देलक अछि ।ओतबे नहि  किछु शाइर तऽ पूरा रूक्रणक स्वरुपे अपना ढ़ंगसँ तय करैत छथि । जाहिसँ पूर्ण रुपे सहमत नहि भेल जा सकैछ ।
अपनेक बूझल होयत जे सभसँ पहिले गजल अरबीमे कहल गेल आ गजलक व्याकरणक निमार्ण सेहो अरबेमे भेल जेकर श्रेय खलील इब्रे अहमद बसरीक जायत छनि । जाहि बहर आ रूक्रण च्रक केर फारसी , उर्दू सेहो स्वीकार केलक ।तऽ अहि ठाम प्रश्न उठैत अछि जे मैथिली गजलकेँ  एहिसँ अलग हटबाक औचित्य की ? हमरा हिसाबे मैथिली गजलकेँ  सेहो अरबी बहरके स्वीकार करबाक आवश्यकता अछि । मिथिलाक शाइरकेँ सेहो अपन शेर कहबाक लेल ओहि व्याकरणसँ अलग किछु करबाक प्रयत्न नहि  करबाक चाही ।


एहिमे कोनो संशय नहि  जे अरबी गजलक  व्याकरण पेचीदा अछि मुदा एकर जानकारी अति आवश्यक अछि ।गलती तऽ सभसँ होयत अछि , जहियासँ गजलक इतिहास अछि ,एखन धरि तक सभ शाइर किछु नहि  किछु गलती केने छथि मुदा जखन व्याकरण उपलब्ध अछि , तखन ओकरा नजरिअंदाज करब ठीक नहि , तें एहि गलतीसँ बचबाक प्रयत्न करबाक चाही ।


ओना एकटा और बात कहब जे  शाइरक विचार , ओकर कल्पना , बिम्ब बेसी महत्वपूर्ण अछि गजलक व्याकरणसँ ,मुदा शिल्पक लेल , सृजनक लेल व्याकरणो ओतबे महत्वपूर्ण ।


~ बाल मुकुंद पाठक 

(२७ जुलाई २०१३ केँ लिखल आलेख)

No comments:

Post a Comment