Wednesday, July 29, 2015

अश्विनी कुमार तिवारी केर दस टा कविता

ई-मिथिला पर आइ मिथिलामे पलल-बढ़ल, देवरिया यू.पी. केर रहनिहार अश्विनी कुमार तिवारी केर दस टा कविता देल जा रहल अछि. हिनक ई कविता सब, आन भाषा-भाषीक भ' खाली मैथिलीमे लिखबेक कारणे नहि अपितु रचनाक उत्तकृष्टता, लयात्मकता, शिल्पक सुंदरता आ भाव-भंगिमाक कारणे साझा कयल जा रहल अछि. अश्विनीजी आइ-काल्हि चम्बा, हिमाचल प्रदेश एनएचपीसी लिमिटेडक बैरा स्यूल पावर स्टेशनमे असिसटेंट इंजीनियर छथि - माॅडरेटर.

(1) मैथिली

मैथिली सन मीठ मधुकर , केँ भी नञि छै मधु रे ।
नञि रसालक रस ओते , बस माय के छै कोड़ रे ॥
मैथिली सन प्रीत नेहगर , नइ छै प्रिया केँ प्रीत रे ।
नहि भौतिक नहि आत्मिक , नहि स्वर्गक वास रे ॥
मातृभाषा केँ जँ बिसरि केँ , चाहबै उन्नति करी ....।
आत्मा के शांति मन केँ , नञि बचत किछु पास रे ॥

(2) समाज  

पाँचों आंगुर नहि एक समान ,
मुदा , खाय बेर सब एक ठाम ।
सबहक छै अप्पन अप्पन काज ,
जखनहि मुट्ठी तखनहि समाज ॥
सबहक नहि होयत एक्कहि इलाज
भने रोग बरु एक्कहि व्यथाक ।
मात्र बैदेहि टा छथि बुझि सकैत ,
ककरा लेल कतेक अंश हेतैक ॥
किंतु एखन की समय एलैक ,
बेकति केँ बुधि की हेरा गैलैक ।
बुझैत गप्प नहि छै कनी कनेक ,
चना नै असगर छै भाँड़ फोड़ैत ॥
ढेर जोगीया मठ होयत उजाड़ ,
कहबी छै मीता ई बड्ड पुरान ।
समाज पूर्ण बरु तखनहि कहैत ,
जतय सब बरन हिलिमिलि रहैत ॥
नहि छै अछोप नहि छै विशेष ,
मुदा काज सभक नहि छै एक ।
सभक जरूरति समय-समय पर ,
यौ कतहु सुइ कतहु तरुआरि ॥
 यौ कखन आबि जायत कोन काज
विभिन्नताक बुझु परिचय समाज ।
अप्पन हाथक सब आंगुर समान
बनि मुट्ठी रहू बनि कय समाज ॥


(3) दृष्टिकोण  

जे पुरूख स्त्रीक सानिध्य लेल लुलुआइत छथि !
एक झलक देखितथि गप्प एक्को बेर क' लैतथि ,
प्राण देमय हेतु तत्पर बस इशाराक देर होइत ।
सैह स्त्री सानिध्याकांछी पुरुख पति बनैत देरी ,
पत्नीक लेल पाथरिक कियैक भय जाइत छथि ।
अलभ्य दुर्लभ स्वप्निल स्त्री लेल उत्सुक अबोध ,
पत्नीक प्रताड़ना मे करैत छथि पुरुषत्वक बोध ।
की जे सुलभ सहज प्राप्य से प्रिय नहि होइछ !
की अगम्यक आग्रही केँ प्राप्य रत्न बेमोल अछि !
की यैह मनोभाव कलियुग केँ कलियुग बनबैछ ?

 (4) मदनक सायक 

अहा केहन अपुर्व तोहर छवि, सोहल गै, मनहि मोहलक ।
राति पूनमक छटा जेना शशि, परसल गै, हिय हरसौलक ॥
जेना भोरहरुका अकास रवि, निखरल गै, जहि कठुआयल ।
आरूणि नयना बयन मधुर पुनि, लजरल गै, चित हरषायल ॥
बिहुसैत मुखछवि काँच बयस धनि , लागल गै, मदनक सायक ।
कहल अश्विनी बामहि छथि विधि , उपटल गै, हिय परिचायक ॥

  (5) सैह !!  

घाम बहैत अछि जकरे सबतरि ,
घामक लाज बचायत सैह |
जे मनुक्ख नहि मात्र जन्म सय ,
राम राज्य केँ आनत वैह ||
 अन्नदाता केँ जे समाज नहि ,
सुतय भुक्खल पेट देत |
शोणित केँ जे बुझत मोल गहि ,
उत्थान करत सतत सैह ||
दयाद्र प्रेम नहि भूखल सम्मानक ,
श्रमिक उदर केँ बूझत सैह |
अपन नेह सय नोर मनुक्खक ,
पोछय चुल्हि पजारत वैह ||
मूल उचित मुदा नव कोपलक ,
मोल बिसरि जेतै जैह |
नव सृजन केँ नव पल्लवक ,
वृद्धि आर कहु रोकत केँ ||
नव शब्द नव भाव काव्य महि ,
सिंचैत अप्पन रक्त सैह |
भाषाक निरंतर बहैत प्रवाह केँ ,
बहवैत नित रहता वैह ||

 (6) असंतुलन  

नीक संगे बेजाय नहि रहतै ।
तऽ नीक केँ नीक केँ कहतै ॥
षटरस केँ प्रभाव नहि रहतै ।
तऽ जीह मे स्वाद की बचतै ॥
सब तारा जे सुरुज भ' जेतै ।
दिन केँ महत्व की रहि जेतै ॥
सब मनुक्ख जँ आदर्शे रहतै ।
राम केँ तहन लोक की पुजतै ॥
नीच केँ नहि रहने की बहतै ।
प्रवाह रुकतै तँ वृद्धि की हेतै ॥
जीवन लेल असंतुलन जरूरी छै ।
थम्हि जेतै तँ जीवने की रहतै ॥

(7) बुधियारी 

जँ नहि रहबै लागल ,
तँ कोना रहबै बाझल ,
जिनगी केँ आरि पर ,
कोना रहबै साटल ।

बहुत कठिन छै बाँचल ,
झूठ-सच केँ छै लांछन ,
बीच मे सम्हरि कय ,
प्राण कोना बाँचत ।

गप जे छी कहि रहल ,
अनठौने बरु नहि रहब ,
अमृत केँ चाह मे ,
गरल केँ पिबय पड़त ।

ककर ई समय रहल ,
प्रतीक्षा ककर कयल ,
चौकस जँ रहबै नहि ,
फेर अहाँ की रहल ।

बुद्धि जँ सजग रहल ,
फेर कहु की बचत ,
सब केँ अजवारि लेब ,
जँ प्रेम सँ भरल रहब ।

(8) कविपत्नी

नोचैत माथ कपार पीटैत ,
कविता मे वनिता केँ ढुढ़ैत ,
कविपत्नी केँ कवि बुझबैत ,
अहींक देखि हम छी लिखैत ।
सबसँ बुरबक हमहीं अछैत ,
 मन सँ हमर छी अहाँ खेलैत ,
 कतय अहाँ छी लाइन मारैत ,
बियाहल छी ! नहि छी लजैत ।
बाबू हमर ई की क' देलथि ,
कवि सँ नाता जोरि देलथि ,
वाम बिधाता कोना भेलथि ,
एहन कुलच्छन पिया भेलथि ।
पत्नी छन छन शंका करैत ,
कविक छाती पर मूँग दलैत ,
'अश्विनी' कहल साकांछ रहैत ,
पत्नी नहि ई कविता पढ़ि लैथ ।





(9) चतुष्पदी  

चञ्चल चितवन चितचोर चपल ,
चपला चतुरा चितवासि सखे ।
मङ्गल मृदुल मुकुल मारक मन ,
मनभाव महा मधुराञ्चल हे ॥1॥

मञ्जुल मुकुलित मन मानसरस ,
मनजा मनसा मनगामिनि हे ।
प्राञ्जल प्रमुदित पल प्राप्त पलित ,
पंचशायक धारक मारक हे ॥2॥

जीवन जगत जगत ज्योतिर्मय ,
जपध्यान जपा जपहारिणि हे ।
हे हरि ! हियगति हतप्राणक हल ,
हृदयाञ्चल यात्रिक आयसु हे ॥3॥

'अश्विनि' कहल अब आशकिरण ,
अतुला वनिता अभिलाषि प्रिये ।
चञ्चल चितवन चितचोर चपल ,
चपला चतुरा चितवासि सखे ॥4॥


(10) बेवफा 

बेवफा कहि तँ देलियै बड़ आक्रोश सँ सोचलियै कनिको ,
वफा निभावय लेल अहीं बरु कहु किछु केलियै कनिको ,
जिनगी भरि उम्मीद ओकरे सँ रखलियै मुदा की अहाँ ,
अपनो दिस सँ एकाध कदम आगा बढ़ेलियै कनिको ।
माय बाबू समाज सँ हँसि वो नुका कतेक कनने होयत ,
अहाँक शब्द केँ नहि सम्हारबाक दर्द कोना सहने होयत ,
अहि प्यार केँ सवाल केँ जबाब भला की पुछने होयत ,
बेवफा बुझि ठुकराबै छी जे कतेक देवता पुजने होयत ।
अपना प्यार पर इलजाम लगौने भला कहियौ की होयत ,
समाजक संरचना मे फँसल अहुँ छी ओहो रहले न होयत ,
जे कहानी अपन परिणति केँ नहि पावि सकल मुर्त रूप ,
ओहि प्यार केँ जोगेने रहब दिल मे तँ कहु की होयत ।


रचनाकार संपर्क -
अश्विनी कुमार तिवारी
मोबाईल न0 : 09816050827
Email : ashwininhpc@gmail.com
 

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