Wednesday, July 1, 2015

किछु गजल

ई-मिथिला पर आइ पढ़ू, हमर किछु गजल -बाल मुकुंद पाठक.
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(1).
छै सगरो अन्हार ,किछु नै सुझा रहल अछि
आब केम्हर जाउ ,किछु नै फुरा रहल अछि

मीठ-मीठ गप्प कहि ,जे सत्ता धरि पहुँचल
ओ अंगुरी पर जनताके नचा रहल अछि

जहियासँ फाँट पड़लै खेतसँ घराड़ी धरि
अपनो घर तँ आन सन बुझा रहल अछि

जे रहैत छल शानसँ यौवनमे सभ दिन
ओ बुढ़ारीमे भूखसँ बिल-बिला रहल अछि

जाहि माटिक संस्कारसँ लोक गेलै चान धरि
ओहि माटिके खराब ओ बता रहल अछि

स्वार्थेटा पैघ भेलै आब आजुक व्यवहारमे
पाइ-पाइ लेल लोक -वेद बिका रहल अछि

 वर्ण-17

(2).
खाली फूसिक व्यापार हम देखलहुँ संसारमे
हाल सत्यक लचार हम देखलहुँ संसारमे


की टी.वी. ,की अखबार ,सभमे एतबे समाचार
चोरि ,हत्या ,बलात्कार ,हम देखलहुँ संसारमे

जखनेसँ दंगा भेल ,जाति-पाति केर नाम पर
चमकैत तलवार ,हम देखलहुँ संसारमे

की हाट ,की बजार , छै सभ पर महगी सवार
भूखे जिनगी पहाड़ ,हम देखलहुँ संसारमे

मोन पड़ै घर-द्वार ,गामक पोखरिक मोहार
आ ओ पावनि-तिहार ,हम देखलहुँ संसारमे

सगरो व्याप्त अत्याचार ,छै अनठेने सरकार
सूतल हवलदार , हम देखलहुँ संसारमे

वर्ण-18

(3).
आनक सुख देखि क' कानि रहलै लोक
अपनाकेँ भाग्यहीन मानि रहलै लोक

आमदक स्त्रोत नै, खर्चक द्वार बहुतो
एक्कै पाइ बेर-बेर गानि रहलै लोक

बिसरि अपन भाषा, अपन संस्कारकेँ
अंग्रेजी संस्कृति एत' आनि रहलै लोक

पीबि लेलक घोरि-घोरि लाज-लेहाजकेँ
तनिको नै पैघकेँ गुदानि रहलै लोक

गाम-गाम जरि रहल दंगा-फसादमे
घूमि-घूमि जग्गह ठेकानि रहलै लोक

वर्ण-15

(4).
जे रहैत छल लगमे, ओ दूर भ' गेल
हमर सौंसे करेज भूरे-भूर भ' गेल

बहुते यत्नसँ, घर प्रेमक बनेलहुँ
छुटिते संग सब, चकनाचूर भ' गेल

हाव-भाव ओकर ततेक ने बदलल
ओ बैर नहि रहल, ओ अंगूर भ' गेल

जाहि प्रश्नक उत्तर, बूझल नै हमरा
वैह प्रश्न किएक सोझाँ हुजूर भ' गेल

घुरि आउ मुकुन्द, अहाँ कोनो शर्त पर
आब शर्त सब हमरा, मंजूर भ' गेल

वर्ण-15.

(5).
प्रेममे मीता, बेरबाद छी हम
मूल छथि ओ, अनुवाद छी हम

प्रीतक भाषा, हुनका ठोर अछि
आ दुख भीजल संवाद छी हम

सुखक जिनगी संग काटलहुँ
दुखमे किए, अपवाद छी हम

प्रीतक फसलि, जरलै खेतमे
गिरहत ओ, खाली खाद छी हम

हुनकासँ एहने संबंध, जेना
ओ दिल्ली, आ इस्लामाबाद छी हम

वर्ण-12

(6).
मोनक बेथा ने ककरोसँ कहू
एहि मामिलामे अहाँ चुप्पे रहू

टीस कतबो किए ने बढ़ि जाए
मोने-मोन कानू, मोने-मोन सहू

प्रेमसँ समाज, प्रेमेसँ संसार
प्रेमसँ अहाँ सभक संग रहू

पैघक बात खराबो जौं लागए
सुनिकेँ रहू, उत्तर जुनि कहू

काँट भरल छै बाट जिनगीक
'मुकुन्द' नहुँ-नहुँ बढ़ैत रहू

 वर्ण-12

(7).
नै हरियर नै पीयर छै बेरंगक ई जीवन
नै नोनगर नै मधुर छै बेढ़ंगक ई जीवन

मुहँ बान्हल नदी नै मिलत कहियो जलधिमे
ओहने व्याकुल बेकार बेउमंगक ई जीवन

की सुनत लोक गीत नाद आ की सुनत गजल
पीड़ा कराह सुनि भेल बेतरंगक ई जीवन

कठपुतली भ' नाचै लोक लोकक आँगुर पर
एहि ठाँ गोर हाथ रहितो अपंगक ई जीवन

आब जीयल दुलर्भ छै महँगी आ बइमानीसँ
भेल भ्रष्ट्राचारी तराजूक पासंगक ई जीवन

वर्ण 18 
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