Friday, June 19, 2015

राजकमल चौधरीक कथा 'खरीद-बिकरी'


मैथिली-हिन्दीक अमर रचनाकार राजकमल चौधरीक आइ पुण्यतिथि छनि. राजकमल मैथिली आओर हिन्दी कथा केँ ओहि वर्जित क्षेत्र मे ल' गेलनि  जाहि क्षेत्रक गप्प करब/सुनब तँ लोक पसिन्न करैत छल मुदा लिखबा सँ सदति परहेज करैत छल. ओना जे-से, तत्काल हुनक स्मृति केँ मोन पाड़ैत ओही  वर्जित क्षेत्र मे सँ  एक गोट  कथा 'खरीद-बिक्री' साझा कयल जा रहल अछि, अस्तु  पढ़ल जाय.



दड़िभंगा टावर लग विश्वास बाबूक होटल. देबाल पर टाँगल लिप्टन कंपनीक नवका कैलेंडर.
बड़ी कालसँ देखि रहल छी -चाहक हरियर-हरियर पत्ती बिछैत, खसिआ जातिक छौड़ी, अत्यंत उघरल, मांसल चित्र...
 
छौड़ी आगू नमरल अछि, वक्षक अग्रभागमे गँहीर धारी पड़ि गेल छैक. चित्रकारक अंतर्दृष्टि तूलिकाकेँ वस्त्रक भीतर धरि घीचिक' ल' गेल छैक, ई थिक कला !
 लिप्टनक सुस्वादु चाहक संगे चाहक पात बिछैवाली छौड़ीक मांसल, श्याम देहक संस्पर्श. कला गुरू मम्मट कहने छलाह- कलाक उदेश्य थिक रसोद्रेक ! तेसराँ ,अनुजवर्गक उपनयन संस्कारमे गाम गेल छलहुँ. हमरा दलानक पछुआड़मे जे छौड़ी गोइठा ठोकि रहल छलि, सेहो एही चाहवाली छौड़ी सन छलि. उठल बाँहिक निम्न भागमे एहिना हमर दृष्टि जड़ भ' गेल छल. अपन फाटल नूआमे वक्षभाग समेटि लेबाक ओकर असफल चेस्टा एखनहुँ स्मरण अछि. मुदा, कैलेंडर परक एहि चाहवाली छौड़ीक उन्नत वक्षकेँ पसरल आँचरमे के समेटि देतैक ?

होटलक नौकर लग आबिक' बाजल -'मालिक, चारि आना दू कप चाहक भेल, आ दस पैसा दू टा सिकरेटक.
कलाक संसारसँ सत्यक दिशामे...
हमरा सोझाँ टेबुल अछि, टेबुलपर चाहक खाली प्याला, प्यालामे सिगरेटक मिझाएल टुकड़ी.
हमर सोझाँमे रेडियो बाजि रहल अछि, गीत उठि रहल अछि- ले के पहला-पहला प्यार, जादू-नगरी से आया है कोई जादूगर...

गीत सुनिक' चाहवाली छौड़ी मोन पड़ैत अछि. चाहक पत्ती बीछिक' ओ चाह बगानक बड़ा बाबू लग जायत. बड़ा बाबूक गारि सुनिक' कुली सभक मेट लग जायत. मेटलगसँ जायत अपन घर. जत' ओकर बेमार बेटी कनैत-कनैत सूति रहल छैक...एक कप चाह आर लाबह' -हम बजैत छी.

लिप्टनक कैलेंडर, कैप्सटनक सिगरेटक पसरैत धुआँ, चाहक प्याला पर प्याला, होटलक नौकर आ हम. ई सब जिनगीक पहिया थीक, एकरा रोकब संभव नहि. किएक तँ एहि पहिया सभक धूरी थिक - रूपैआ, रूपैआ !
अट्ठाइस-उनतीस बर्खक एकटा स्त्री, पंजाबिन युवती, शरणार्थी युवती, हिन्दू-मुस्लिम दंगामे जकर सभ किछु, भूत, भविष्य, वर्तमान झरकि गेल छैक, हमरा लग आबि ठाढ़ भ' गेल. बाजलि, हँसैत बाजलि- 'बाबू, एक कप चाय पिला दो !

हम भवभूतिक नाटक पढ़ने छी. ईहो जनैत छी, "यत्र नार्यास्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता: ".
मुदा,
ई लज्जाहीना, मर्यादाहीना, सतीत्वहीना स्त्री की पूजाक योग्य थिक ?
ई स्त्री त' भवभूतिक मालती, मदयन्तिका, कामान्दकी, बुद्धरक्षिता, लवंगिका, अवलोकिता आ सीताक नामो नहि सुनने हएत.

होटलमे बैसल सभ व्यक्ति उचकि-उचकि क' आँखि वक्रक क' कटाक्ष करैत, शरणार्थिनीक चित्थी-चित्थी भेल नूआक पार्श्वसँ स्पष्ट होइत अंग अंग केँ देख' लगलाह.
अकस्मात् चाहक पिआसलि स्त्री हमरा सोझाँमे लागल कुर्सी पर बैसि गेलि. हँसैत आँखि नचबैत बाजलि- 'चाय पिला दो बाबू, सुबह से नहीं पिया है'.

साँझक हल्लुक अन्हार चारूकात पसरि गेल. साँझक हल्लुक बसात, हल्लुक सिहकी, हल्लुक आलस्य हमरा शरीरमे पैसि गेल.
निर्लज्ज भ' क' कहलिअइ -'विश्वास बाबू ,दू कप चाह पठा दिअ'.
चाह आबि गेल.
भूखल गाय जकाँ ओ चाह सुड़क' लागलि. हमहूँ संग दैत ओकर अंग भंगिमा देखैत रहलहुँ.

आधा कप चाह समाप्त क' बाँहिसँ ठोर पोछैत ओ बाजलि- 'बाबू आप कहाँ रहता है ? क्या करता है ?'
ताहिसँ तोरा कोन काज ? प्रश्न केलियैक.
उत्तर भेटल- आप बहुत अच्छा आदमी है. ऐसे तो कोई बिना बाँह पकड़े एक पैसा भी नहीं देता है'. उत्तर द' क' कुर्सीसँ ससरल मैल रेशमी साड़ीक आँचर उठबैत कुर्सीक पीठमे ओंगठैत, देह मोड़ैत आ मधुर भावे हमरा दिस ताकि मुस्कायलि.

क्षण मात्रमे स्त्रीक असंख्य चित्र हमरा आँखिमे पसरि गेल- नाच करैत स्त्रीक चित्र, कथकलीक मुद्रामे दहिना पयर उठौने, गरदनि टेढ़ कयने, आँगुर छितरेने, बाँहि मोड़ने, पुष्ट पीन वक्ष हिलबैत स्त्रीक चित्र. गृहस्थ स्त्रीक चित्र, केबाड़क अ'ढ़सँ सड़क दिस तकैत , स्वामीक प्रतीक्षा करैत, सासु-ननदिसँ झगड़ा दन्न करैत, पतिक पएर धोइत, बालककेँ दूध पीयाबैत, देअरसँ हँसी ठठ्ठा करैत स्त्रीक चित्र. अशोक वाटिकामे राक्षसी सभक मध्य बैसलि, सीताक चित्र. हरिणक शावककेँ सिनेहसँ खेलबैत, शकुन्तलाक चित्र. अभिमन्युक शव लग विलाप करैत, उत्तराक चित्र.गौतम पुत्र राहुलकेँ कथा-पिहानी सुनबैत, यशोधराक चित्र.

मुदा, अपरचित युवकसँ ओकर बासाक पता पुछैवाली ई युवती के थिक ? की एकर इतिहास ? की एकर भविष्य ?
कथाकार ललितक गल्प 'मुक्ति' आ मुक्तिक शेफालीक चरित्र-कथा पढ़ि, मिथिलाक नारी क्रोधसँ भरि उठलि, मिथिलाक पुरूष घृणासँ भहरि उठलाह.

मुदा, दरभंगाक टावर लग ठाढ़ि एहि शरणार्थिनीकेँ किओ भद्र महिला, किओ सुपुरूष शरण किएक नहि दैत छथिन ?
यैह थिक हमर प्रश्न !यैह थिक हमर सत्य ! यैह थिक हमर दर्शन !

एहि पंजाबिन युवतीकेँ एकटा घर चाही, एकटा परिवार चाही, एकटा पति देवता चाही. एकरेटा नहि, देशक सभ युवतीकेँ एतबा चाही. से जाबत नै भेटतै ताबत असंख्य शेफाली, असंख्य फुलपरासवाली, असंख्य दयामन्ती एहिना चाह माँगैत आ देह बेचैत रहतीह !
पुछलियैक- अहाँ हमरासँ बिआह करब ?
'अहाँ.....?'
चाहक कप खाली करैत ओ हँसलि ! बताहि जकाँ हँसय लागलि. हँसिते बाजलि- बाबू,सब पहले ऐसे हीं कहता है. अपना घर में ले जाता है. चार दिन मौज करता है. फिर निकाल देता है. हम जानता है आप भी ले जाएगा तो ऐसा हीं करेगा.
बुझ'मे आबि गेल.एहि युगक परम सत्यसँ एहि स्त्रीकेँ पूर्ण साक्षात्कार छैक.

विश्वाश बाबूक होटलसँ उतरिकेँ सड़क पर अयलहुँ. पाछू-पाछू ओहो उतरलि. हमरा संगे चलैत बाजलि- बाबू इसमे आपका कोई कसूर नहीं है. आप पैसा देता है. मुफ्त में पैसा क्यों देगा ? हमारा पास देने को है हीं क्या ? देह है, सो देता है ! ये बिजनेस है बाबू, इसमें बुरा बात क्या है'.
बिजनेस ! व्यापार ! व्यवसाय.....!
ई युवती शरीरक व्यवसाय करैत अछि. एहिसँ दोख की , पाप की, अधलाह की ? पुछलियै- 'अहाँ कतेक लै छियै' ?
'सुबह से कुछ नहीं खाया है. कुछ खिला दीजिए बाबू, फिर जो कहिए, करूँगी' -कहैत कहैत ओ हमर बाँहि ध' लेलक.
एहिसँ सस्त आर की ?
फेर होटल दिस घूरि अयलहुँ. विश्वाश बाबूकेँ कहलियनि- 'ई जे खाथि, खुआ दिऔन. पैसा हमरा नामे लिखि लिअ'. हमरा दिस बिना तकनहि ओ होटलमे पैसि गेलि.
हम ओकरा दिस बिना तकनहि होटलसँ बहरा गेलहुँ.

3 comments:

  1. जेना मैथिली में हरिमोहन झा दोसर नहि भेला तहिना राजकमल चौधरी सेहो दोसर नहि हेता । दूनू गोटा अलग अलग विधा में लिखला परञ्च जे कॉमन अछि जे से कि दूनू गोटा के मनुख्खक मन के भाव पर अद्भुत पकड़ छलैन्हि आ ओकरा कलम के माध्यम सँ प्रकट करय में उत्कृष्ट छलाह ।

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  2. Lacharipan ko likh pana..sabke bas Ki batt nhii..jo likh gya mahan lekhak Ho gya..

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