Tuesday, June 16, 2015

विकास झा केर किछु कविता

ई-मिथिला पर आइ मधुबनीक हरिणे(हरलाखी)केँ रहनिहार विकास झा केर किछु कविता देल जा रहल अछि. विकास झा एखन भुवनेश्वरमे रहि इंजीनियरिंगकेँ पढ़ाइ क' रहल छथि. ई मैथिली लेल कतेक नीक बात छैक जे लोक, अपन माटि-पानिसँ दूर रहितो, आनो- आन सेक्टरमे काज करितो मिथिला मैथिलीकेँ विकासमे सहभागी बनि रहल छैक -माॅडरेटर.
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(1.) कोकनल बुधि

खुँटेस दिअ हमरा
पारि दिऔ चौखटि धरि
लछमणक डाँड़िह
गरोसने रहू हमरा
मंगल सूतक गरदानीमे
किएक होयत हमरा अजगुत
हम जन्मलहुँ किएक ?
अहीँक खबास बनबा लेल !
किएक होयत सेहन्ता
हमरा घोघ हटेबाक
पहिरबाक बुसट आ जींस
कोना करब ई उतकिरना
भजारक संग टहलब हाट
बहिनपाक संग निधोख
करब नैन मटक्का
नहि नहि !
हमरा रखबाक अछि
अहाँक नाक टीक
बरु घोंटि ली अपन जिनगी
मुदा अबाद रहे अहाँक चिनगी
धुर !
आबो तेजु ई कोकनल बुधि
बहराउ अकाबोनसँ
पुरू हमर बाँहि
मिलाउ कन्हा हमरा संगे
जौं अहाँ बीस तँ हमहुँ उनैस नै ।

(2.)निस्तब्ध

पोखरिक मोहार पर
ओसैत छथि शीत
घमायल ललौंच सूर्य
डम्हरस सिनुरिया सन
घुरि रहल अछि हेंजक हेज
चराउर परक माल जाल
टुनटुनबैत
गरदानी केर झुनझुना
आबि गेल अछि चिड़ै चुनमुन्नी
अपन खोंतामे
घोघमे भरने चिल्हाउरक कलउ
मेसा गेल अछि सौँसे
धुमनक सुगंध ,
माटिक सोहनगर गंध
अभर' लागल अछि
अकासक ह्रदय कुहरमे
सहसह तरेगन
आ की छीटि देने होय
मुट्ठी भरि भगजोगनी
मकानक फुनगी धऽ बैसल
निस्तब्ध
हेरैत छी अहि रम्य साँझकेँ
हूँकि रहल अछि पछबा
हमर विछोहक दरेग
कल्पनाक व्योममे हम
हुनक उजोतक टेमी पर
निछा रहल छी
दीप परक फनिगा जँका
देखैत छी चानक मुँहठोर
कनेक मलिन ,कनेक विहुसल
पूछि रहल हो किंवा यक्ष प्रश्न
जाहि प्रतिउत्तरमे
आइ धरि तकैत छी
अपन चानक मुहँठोर
निस्तब्ध
मकानक फनगी धऽ बैसल।

(3.)पर्यावरण दिवस

आइ भोरे
गेलहुँ गमेसरि गाछी
पुछबाक लेल कुशल-क्षेम
बतियेबाक लेल नीक बेजाय
नजरि परल
बूढ़ बिज्जू आमक गाछ
सिसोहल ओकर चाम
झहरैत गाढ़ भेल नोर
व्यथित क्रंदित
ओ कहलक निजगुत
फुलैत अछि दम हमर
कोना लिअ स्वांस हम
छीटि देलक अछि बसात मे माहुर
कसाय मनुक्ख
निरीह भेल जा रहल छी
देखहक तैयो
अपन घोघ मे देने छियै बास
मारिते रास चुट्टी-पिपरी केँ
सह सह खोंता देखहक चिड़ै-चुनमुन्नीक
मुदा प्रतिफल की भेटैत अछि
आ भऽ गेल चुप्प
ढबसि गेल नोर हमरा
की दितियै मंगलकामना
ओकरा नहीं बुझल रहैक
लोक मनबै छैक ओकरा नामे
अपना खातिर
पर्यावरण दिवस ।

(4.)जेठक दुपहरिया 

जेठक दुपहरिया
उगिल रहल अछि
आगि !
भोरे
झाँझनक फ़ाँक सौं
बिहुंसैत अछि
सुरुजक किरिन
तप्पत करैत अछि
पानि-बसात।
कौखन
अकछा दैत अछि
आँजुर भरि पानि लेल
कौखन
आफद करैत अछि
निकसब गेह सौं ।
अहि दुपहरिया मे
उपटैत अछि डीह
टौआइत अछि
माल जाल
दहकैत अछि
गाछ बिरीछ
झौंसा गेल अछि
इनार पोखरि ।
बीअनि हौंकैत
बूढ जुआन
सब तकैत छथि
छाहरि
अपस्याँत भेल
झरकी सौं।
इ चंडाल सन
दुपहरिया
डाहि देलकैत अछि
बसातक करेज
मुआ दलकैत अछि
कतेको जिनगी
तैयो अकरल अछि
भखरल नहि
ई जेठक दुपहरिया।

(5.)यौ बुद्ध 

यौ बुद्ध !
अहाँ कोना जितलहुँ
मोनक द्वन्द युद्ध
कोना नहि टिसलक अहाँकेँ
अपन कोंखक वियोग
यशोधराक भोग
कोना भ' गेलहुँ
आकार धेने निर्विकार
बड्ड गुनैत छी हम
अहाँक जिनगीक भोर साँझ
कचोट अछि हमरा
अहाँक केलहा अधलाहक
बरु श्रापि दिय हमरा
मुदा नहीं कहि सकब हम
अहाँकेँ साधू
कृत्य अहाँक पतित अछि।

रचनाकार संपर्क :
विकास झा
इमेल :vikash51093@gmail.com
फोन : 09776843779

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