Tuesday, June 2, 2015

अरूणाभ सौरभ'क मातृभाषा केन्द्रित कविता

ई-मिथिला पर आइ पढ़ू साहित्य अकादमीसँ पुरस्कृत युवा कवि अरूणाभ सौरभक किछु कविता. ई कविता सब पटनासँ प्रकाशित पत्रिका 'घर-बाहर'क नव अंक (अप्रैल-जून,2015)मे प्रकाशित भेल अछि. हिनक ई कविता सब ततेक ने नीक लागल जे एहि ठाम सेहो साझा कऽ रहलहुँए -माॅडरेटर.
=====================================================

मातृभाषा
(एक)
अहाँ ओसक पहिल बुन्न
आ भोरूका सुरूज सन
टुहटुह लाल
ओहि सँ
गाछ-पात मे आएल हरीतिमा

अहाँ साँझुक मलिन अकास
अहाँ भरिदिनुका थकौनी
सँ राति मे
टटाएत पएर
जकरे ओढ़ैत-बिछबैत छी
सगर राति हम

हे हमर मातृभाषा
अहाँ जीवनक अशेष उमेद
आ हमर
पहिल प्रेमक
कोमल छुऔन
आ चुम्बन सँ
उठैत सिहकी-सिसकी
हमर मैथिली
अहाँ दूध-बताशा
मिश्री आ सकरपेड़ा
पियास मे समुद्र सन
सम्पूर्ण वायुमंडलक वितान

अहाँ मे रचए चाहब
मुक्तीगीत
जे हमर गामक
आय-माय-मैयाँ
कानि-कानि बजबैत अछि हमरा
तेँ किछु आर
जेना कि सिनेह...

(दू)
अपन गाम सँ जे
भेटल सिनेह-फटकार
मान-अपमान-सम्मान संग
ओतुक्का लोकक संग
जे भेटल
मित्रता-शत्रुता-कटुता

चुटकट-चिरकुट
लोक संग रहि
भेलहुँ प्रपंचक
कतेको बेर शिकार
कतेको बेर हेराएल वस्तु
एक-एकटा
हमर एही गाम मे

जे जतबे मीठ
ओतबे तीत
जे जतबे खटगर
ओतबे कसगर
जे समुच्चा सुआद
जे अपन गामक
भेटल सिनेहक
आखर केर
एक-एकटा सम्हार-अनसम्हार
तेँ किछु आर
जेना बजैत मातृभाषा

तेँ किछु आर
जेना करैत कविता
अपन मैथिली मे


मोन पाड़ि काटैत जाड़क बिसबिसी
(एक)
बिसबिसी-कनकनी जाड़क
बढ़ले जाइत अछि
कोढ़-करेज कए
देत बरफ अही बेर
अही ठाम
छगुन्ता अछि हमरा
अही टीशन पर बैसल
हेंजक-हेंज यात्रीक
आएब-जाएब
ककरो हाथ चाह
पानिक बोतल ककरो हाथ
केओ जैकेट मे
नुकौने अछि अपन हाथ
ककरो दस्ताना मे हाथ
ट्राॅली बैग लेने हाथ
अटैची पकड़ने हाथ

आनंद विहार टीसन पर राति
अन्हार आ कुहेसक राति
सबहक सेहन्ताक राति
रेलगाड़ीक लेट-विलेटक राति
ट्रेनक प्रतीक्षाक राति
कोढ़ मे पैसल हुदहुदीक राति
एहि राति मे
सात घंटा लेट अछि ट्रेन

एहन राति मे
विचित्र लेट ट्रेनक राति
कि राति सँ
जिलिगा भए गेल अछि
जिलिगा भए गेल अछि ट्रेनो सँ

कि मोनक दरेग आ कोनटा मे
नुकाएल छली प्रेयसी प्रगट भए गेली
जकरे मोन पाड़ि-पाड़ि
काटैत रातिक बिसबिसी मे
गरमीक निभरोस
अभास अभरत
हमरा...

(दू)
सबहक अपन-अपन यात्रा अछि
अपन-अपन ट्रेन
अपन एयर बैग-ट्राली
अपन बोरा-झोरा
जाहि भीतर
निश्चित नुकाएल छै
पोटरी सिनेहक गाम लेल
हम चोर नहि
जे चोरा ली
ओहि पोटरी सँ वस्तु-जात
सबहक पोटरी मे
नुकाए देबए चाहै छी
अपना दिस सँ
कने-कने सिनेह
हम अहींक कवि छी

हे हमर समांङ लोकनि
जतय जाइ छी, जे गाम-शहर
निश्चिते जाउ
सबहक यात्रा
शुभ होय
मंगलमय हो...

रचनाकार संपर्क :
अरूणाभ सौरभ
ई-मेल :arunabhsaurabh@gmail.com
मोबाईल : 09871969360

No comments:

Post a Comment