Tuesday, March 24, 2015

गुंजनश्री'क किछु कविता

साहित्य आ रंगकर्म दूनुमे समान रूपे सक्रिय छथि गुंजनश्री . आइ-काल्हि पटनामे रहैत छथि , पढ़ितो छथि  पढ़ाबितो छथि .गीत-संगीतमे सेहो बेस जानकारी छनि , तहिना गाबितो छथि -लोकगीत ,सोहर , गजल, कौव्वाली खैर ई सब फेर कहियो एखन हिनक किछु कविता साझा कऽ रहल छी , अहूॅ पढ़ू -माॅडरेटर.
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(1). एकटा बात कहू आहाँ

एकटा  बात  कहू आहाँ,
की आहाँ बिसरि गेलहूँ ?
अप्पन ओ साजो-सिंगार,
जे आहाँक,
अतुल्य धन छल ?

आई आहाँक आतंरिक व्यक्तित्व पर,

बाहरी दिखावा भारी पड़ी गेल,



प्रिये ! 

कहू ने ?

कोना ऐहन भ' गेलहूँ आहाँ ?

(2). आहाँ कहने रही एक दिन, यौ,आहाँ बिनू नै होइत अछि निन्न, 
  
आहाँ कहने रही एक दिन,
यौ,आहाँ बिनू नै होइत अछि निन्न,

आऊ आ आबिक’,

’  जाऊ हमरा,

आहाँ नै बुझब त’,

के बुझत हमरा,

फेर आहाँ तमासाइत’  कहलहूँ,

पुरुखक’  जाइत होइते छैक पाथर,

आ उपमा देलहुँ आहाँ,

भँवरास’  हमरा,

आहाँ फेर कहलहूँ,

बाजू ने यौ”,

बौककियैक भेल छी,

किछु त’  ने बाजि सकलहूँ हम,

अपने मोन में अपनेस’,

ओझराइत रहलहूँ हम.

आँइठ  छोड़ल चाह’  सन,

सेराइत रहलहूँ हम,



प्रिये ! की कहू हम,

ओहि दिन हमर,

हालैत नहिं छल किछु कहबाक’,

आइ अनुमति नहीं अछि किछु बजबाक’,

परिस्थितिवश हम-आहाँ,

आइ फराक छी जगती के आँगन में,

आहाँ के देखि संतोख करैत छी,

अपन मन-आँगन में ,

ठीके, परिस्थिति मन्नुख के,

नचनी-नाच लगा दैत छै,.....

 (3).किछु दिन भेल, दिल्ली स’ पटना लौटैत रही 

 किछु दिन भेल,  
दिल्ली स’ पटना लौटैत रही,
मोनहीं मोन एकटा बात सोचैत रही,  
ताबेत एकता अर्धनग्न बच्चा सोझा में आयल,
आ कोरा में अपनों सौ छोट के लेने,
 चट्ट द’ सोझा में औंघरायल,  
हम सोचिते रही  जे आब की करि,
 बच्चा बाजल,-
 सैहेब आहां की सोचि रहल छि ?
 हम त’ आब अपनों सोचनाय छोड़ी देने छि,  
जौ मोन हुए त दान करू,  
हमरा हालैती पर सोच क’ नै हमर अपमान करू,  
बात सुनी ओकर जेबी में हाथ देलहुं,
  आ ओकर तरहत्थी पर किछु पाई गाइनि देलहुं,
 डेरा पहूँची क’ सोचलहूँ की हम ई नीक केलहुं,
 या एकटा निरीह नेन्ना के भिखमंगी के रास्ता पर आगू बढ़ा देलहुं,


प्रण केलहूँ अछि जे आब ककरो भीख नहीं देब,
 
भगवान् आहाँ हमर प्रण के लाज राखी लेब,
जा हम त अपने भीख मांगी रहल छि भगवान् सौ,  
जो रे भिखमंगा,....छिह.......

(4) . सिहरी गेल मोन, चौंकि गेलहूँ हम 

सिहरी गेल मोन,
चौंकि गेलहूँ हम,
चेहा उठल स्मृति,
मेज पर राखल टेबुललैंप,
बेजान सन,
भुकभुकाईत रहल,
आ हम,
एही भुकभुकी में,
ताकि लेलहूँ,
अपन जिनगी,
आ जिनगीक सब रंग के,
अबधाईर लेलहूँ,
हमहूँ आब मशीन जकाँ,
स्विच स’ ओन आ ऑफ,
होइत रहैत छी,
जखन तखन,

बीती जो रे जिनगी,
नहीं अछि सहाज,
आब बस ......

रचनाकार संपर्क:
गुंजनश्री
मेल-gunjansir@gmail.com
मो. -9386907933
(गुंजनश्री डाॅट काॅमसॅ)

2 comments:

  1. गुंजनक कविता अपन विशिष्ट शिल्प आ संवादक कारने पाठक पर विशेष प्रभाव राखैत अछि आ हम कोनो समाज सं बाहर नहि छि,तें हमरो......

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  2. ई सब त' बहुत पुरान कविता सब छैक| आभार ई-मिथिला आ विकास|

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