Monday, March 2, 2015

आइ सब क्षम्य , आइ रंगपर्व होली छै .

फागुनक उमंग चरम पर अछि . लोक-वेद सभ एहिसॅ मातल सन अछि . गाम-शहर सभ ठाम खूबे फगुआ गाओल-सुनल जा रहल अछि . किंतु मिथिलामे, आब ओ फगुआ गीत सभ नै रहलै ,जे एक दशक पहिने तक लोकक ठोर पर रहैत छल . सदा आनंद रहे एहि द्वारे , मोहन खेले होरी हो 'क जग्गह  जीजा-साली ,भौजी-देवर सन-सन खूबे अश्लील मैथिली-भोजपुरी गीत सुनल जा रहल अछि .साहित्यकार लोकनि सेहो खूबे अश्लीलताक बढ़ा रहल छथि .एखन फेसबुकपर सेहो एहने-सन खूबे अश्लील गीत-जोगीड़ा लिखल आ शेयर कयल जा रहल अछि . एहन समयमे सोशल मीडियापर सक्रिय रहितो , मिथिलासॅ कोसो दूर हैदरबादमे रहनिहार युवा साहित्यकार मनोज शांडिल्यक 'फगुआ' पर एकटा कविता पढ़लौं .बहुत सरल ओ सहज भाषामे लिखल ई कविता पारंपरिक फगुआ'क स्मरण करा रहल अछि. साझा कऽ रहल छी ,अहूॅ पढ़ू - माॅडरेटर
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 फगुआ

आइ तँ
हवो लगैत अछि
किछु भसिआयल सन
बहकैत सन बहैए
एम्हर-ओम्हर
लुढ़कैत-खसैत-पड़ैत..

रंग-रूप सेहो छैक आइ
बेस रंगायल सन
उचिते छै
बसात संग मिज्झर
आबारा उड़ियाइत जतय-ततय
 रंगेक तँ बोली छै
आइ सब क्षम्य
आइ रंगपर्व होली छै..

आइ कोनो रंग पर
ककरो एकाधिकार नहि
ने लाल पर
ने हरियर
ने केसरिया, आ ने
उज्जर की पीयर पर
आइ सबहक सब रंग पर अधिकार
 रंग मे मिज्झर रंग
रंग मे मिज्झर लोक
आइ बस अगबे
मदमत्त मनुक्खक टोली छै
आइ सब क्षम्य
आइ रंगपर्व होली छै..

ओना आइ तँ मात्र
आधिकारिक रंगोत्सव छैक
धरि एकर बादहु होइत रहतैक
सभ दिन रंगक खेल..

अनवरत बदलैत रहत
चढ़ैत उतरैत रहत
हमरा-अहाँ-हुनका सन लोक पर
तरह तरह के रंग 

ककरो आँखि सँ, आ
ककरो छाती सँ खसतै रंग
ककरो धिया-पुताक छिपली सँ उड़ि
ककरो जेबी मे जा पैसतै रंग
ककरो हाथ पर रक्तरूप चढ़ि
 चढ़ले रहतै रंग
ककरो सींथ सँ उतरि
उतरले रहतै रंग..

एह, देखू ने!
आइ केना बहकल अछि कवि
किदन-कहाँदन बड़बड़ाइए
धन्य छैक धरि भाग्य एकर
साफ निकलि जाएत बचि क'
बहन्ना लेल वैह
पीसल हरियर गोली छै
आइ सब क्षम्य
आइ रंगपर्व होली छै...



रचनाकार संपर्क :-
मनोज शांडिल्य
मो.  :09866077693

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