Sunday, March 1, 2015

बहुते बात कहि रहल अछि 'जे कहि नञि सकलहुॅ'

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मैथिलीक लेल ई कतेक दुर्भाग्यक गप्प अछि , जे कोनो नीक पोथी प्रकाशित होइत अछि, फेर साल बीत जाइत अछि आ ओहि पोथीक  कोनो साहित्यिक पत्रिकामे चर्च तक नै होइत अछि आ अन्हरियाक चान सन पोथीक समीक्षा प्रकाशित होइत अछि . कियैक तॅ ई राम भरोस कापड़िक कृति छिएन्ह .आ दीप नारायण विद्यार्थीके पोथीपर चर्च तक नहि , जानि नै एकर की कारण छैक ? जखन की दुनू गजले संग्रह छैक ! खैर एखन दीप नारायण विद्यार्थीक गजल संग्रह 'जे कहि नञि सकलहुॅ' पर लगभग 300 गजल लिखनिहार अमित मिश्रक समीक्षा पढ़ू - माॅडरेटर .
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नव घर उठय , पूरान घर खसय' ई फकरा कतेको वर्षसॅ सुनल-सुनायल जा रहल अछि . ई प्रकृतिक नियम छै । फूलक गाछमे जा धरि एकटा फूल मौलाइत नै छै ता धरि दोसर फूल फूलाइत नै छै । ओना जखन समाज आ साहित्यक गप्प उठैत अछि , तॅ ई नियम कनेक बदलि जाइत अछि ।तखन " पूरान घर उठल रहय आ नव घरकेॅ उठबैत रहय" ई फकरा बेसी सुन्नर आ सटीक लगैत अछि ।ओना साहित्यमे किओ ककरो घर नै उठबैत अछि आ नै घरक उठेनाइ साहित्य छै ।नव घर उठेबाक तात्पर्य अछि कोनो नव रचनाकारक (युवा वा बुजुर्ग )के पूरान रचनाकार द्वारा प्रोत्साहित करब ।खास कऽ जखन कखनो कोनो युवा रचनाकारक गप्प उठैत अछि तॅ ई कर्तव्य बड़ बेसी बढ़ि जाइत अछि ।किएक तॅ युवाक मोन एकटा अबोध नेना जकाॅ चंचल होइत अछि ।खन ई विद्या ,खन ओ विद्या करैत-करैत युवा रचनाकारक सबटा ऊर्जा व्यर्थ भऽ जाइत छन्हि ।तें युवाकेॅ नीक मार्गदर्शन देब बड़ जरूरी भऽ जाइत अछि ।

हालमे अनुभवी नव-पूरान व्यक्यित्वक देख-रेखमे मैथिली साहित्यक अथाह पोखरिमे एकटा नव कमल फूलाएल अछि दीप नारायण विद्यार्थी ।वर्ष 2014क आरंभमे विद्यार्थी जीक पहिल पोथी 'जे कहि नञि सकलहुॅ' आयल अछि ।ई पोथी मैथिली गजलक संग्रह अछि ।गजल विद्या पूरान रहितो मैथिली लेल नव अछि ।मैथिलीक पहिल गजल जीवन झाक नाटकमे भेटैत अछि जे शाइत 1905ई मे आयल छल ।तें मैथिली गजलक इतिहास कोनो नव बेसी पूरान नै अछि ।पछिला किछु सालमे मैथिली गजलक क्षेत्रमे क्रान्ति आयल अछि आ लगभग दर्जन भरि पोथी छपल अछि ।एहि क्रान्तिक उपज छथि दीप नारायण विद्यार्थी आ हुनक पोथी जे कहि नञि सकलहु ।

ई गजल संग्रह , अपनासॅ पूर्व आयल सब पोथीसॅ फराक अछि ।ई अंतर पोथीक आवरण ,दाम, पृष्ठ आ गजलक स्तरसॅ साफ-साफ देखाइत अछि ।गजलक विषयमे गजलकारक कहब छन्हि 'गजलक सौन्दर्यक उपमा तॅ स्वर्ग सुन्दरी मेनकासॅ सेहो नै देल जा सकैत अछि ' । से हिनक कहब सत्ते अछि किएक तॅ गजल अपन बनाबट आ भावक सुन्दरतेक कारण एते प्रचलित भेल अछि ।वस्तुतः गजल काव्यक एकटा भाग अछि ।काव्य जकाॅ गजलोमे लचक रहैत अछि जे काव्य पाठके सुन्दर बनबैत आ एहि पोथीक सबटा गजलमे गेयता भेटैत अछि ।गजलक एकटा आर विशेषता होइत अछि 'ओकर शेरक कथन भाव ।एकटा गजलक सब शेरक भाव जॅ अलग-अलग होइ तॅ ओ गजल सबसॅ बेसी  ओजनदार  होइत अछि  ई विशेषता एहि पोथीक अधिकांश गजलमे भेटैत अछि ।गजलकार समाजक प्रति साकांक्ष छथि ।समाजमे घटैत सभ घटना पर हिनक सुक्ष्म नजरि छनि ।देश-दुनियाक सबटा घटनाकेॅ अपनामे समटै बला अखबार पर एकटा सुन्दर शेर कहैत छथि -
                            "जे कोनो अखबार भेटत ,एतबे समाचार भेटत
                            चोरि डकैती तॅ आम भेल ,हत्या आ बलात्कार भेटत"

ऐसॅ बढ़ि कऽ आजुक समाजक चित्रण और की भऽ सकैए ।भाइ-भैयारीमे पड़ैत फूट आ बाॅट-बखरा पर बड महीन दृष्टि देल गेल अछि -
                             "जाहि घरकेॅ अपन बुझलहुॅ
                              ओहि घरमे मेहमान छलहुॅ"

आजुक युवाक एकटा पैघ कमजोरी अछि आ ओ अछि प्रेम ।ई उमरिये एहने होइत अछि जे प्रेमसॅ पिण्ड नै छोड़ाओल जा सकैत अछि ।अधिकांश प्रेमी-प्रेमिकाकेॅ अपन अराध्य प्रेमसॅ दूरे रहऽ पड़ैत छन्हि ।एहने स्थिति पर एकटा शेर बड़ नीक जकाॅ देखबैत छथि -
                           "ह्रदयमे अहीं केर आस लऽ कऽ सुतल छी
                           अखनो अधखिज्जु पियास लऽ कऽ सुतल छी"

प्रेमसॅ जखन मोन टूटैत अछि तॅ कहैत छथि -
                        "स्नेहक बात पियारक बात
                        सबटा अछि बेकारक बात "


समाजमे सब रंगक लोककेॅ रहबाक पूर्ण अधिकार अछि आ यैह समाजक मजबूत पीलर अछि ।आइ-काल्हि विभिन्न जाति ,धर्मक नामपर कलह भऽ रहल अछि आ एहि सबकेॅ गलत बतबैत कहैत छथि
                     "मंदिर-मस्जिद बाॅटि लिअ ,राम-रहीम खुदा नञि बॅटत
                       बाॅटि लिअ जमीन केर अउॅठा-अउॅठा हवा नञि बॅटत
                     जाति-पाॅति बाॅटि लिअ चाहे धरम करम बाॅटि लिअ
                       बाॅटि लिअ जे किछु भैयारि चान-सुरूज मुदा नै बॅटत"

ई शेर सभ तॅ मात्र बानगी छल , एहन-एहन कतेको ओजनदार शेरसॅ ई पोथी भरल पड़ल अछि ।
गजलकारक अनुसार एहि पोथीमे संग्रहित सबटा गजल सरल वर्णिक छन्दमे अछि , मुदा ई गजलक मूल छन्द नै अछि ।गजलक मूल बहर अरबी अछि तें एहि पोथीक सबटा गजल ,गजलक असली छन्दपर सटीक नै बैसैत अछि ।एहि संग्रहक किछु गजलमे हिन्दी-उर्दू शब्दक प्रयोग भेल अछि जतऽ मैथिली शब्द सेहो राखल जा सकैत छल ।ओना गजलक भाषाक संबंधमे गजलकारक अपन मत छन्हि  "गजलकेॅ कोनो भाषामे बान्हल नै जा सकैत अछि ।संगहि गजल कमसॅ-कम आखरमे पैघसॅ पैघ बात कहबाक सामर्थ्य रखैत अछि" ।हिनक कहब कोनो गलत नै छन्हि ,मुदा लेखकक प्रयास सदिखन हेबाक चाही जे जाहि भाषामे लिखी वएह भाषाक शब्दक प्रयोग करी ।ओना गजलक लेल भावकेॅ प्रधानता हेबाक चाही ।किएक तॅ गजल कहल जाइत अछि ,लिखल नै ।तें एहने गप्प कहल जाय जे श्रोताकेॅ शीघ्र आ नीक जकाॅ बुझनामे आबि जाय ।

जखन गप्प भावक उठैत अछि तॅ विद्यार्थी जीक गजल बड़ किछु कहि रहल अछि ।तें ई पोथी पाठकेॅ पूर्ण मनोरंजन करबामे सक्षम अछि आ उठाओल गप्पपर सोचबाक लेल सेहो मजबूर करैत अछि ।हमरा विश्वाश अछि जे एहि पोथीके खूब प्रेम भेटतै ।जे हम नै कहि सकलौं से सब एहि पोथीक गजल कहत । गजलकारो तॅ यैह कहैत छथि -
                  " अहीॅक सवालक जवाब कहैत छी
                 जे कहि नञि सकलहुॅ आब कहैत छी"

पोथी    -      जे कहि नञि सकलहुॅ
रचनाकार - दीप नारायण विद्यार्थी
प्रकाशक-   मैथिली साहित्यिक आ सांस्कृतिक समिति ,मधुबनी

पोथी प्राप्तिक लेल 9430583847  पर विद्यार्थी जीसॅ पर संपर्क करूॅ .

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