Friday, February 27, 2015

व्यक्तिगत पीड़ा बिसरबाक माध्यम अछि 'चरिपतिया'


आइ- काल्हि फेसबुकपर मैथिलीमे एकटा नव विधा खूबे पंसंद कयल जा रहल अछि . एहि विधामे मोटा-मोटी एकटा दोहा कहूॅ वा एकटा शेर कहूॅ , से लिखल जाइत अछि , जे चारि पाॅतिमे विभक्त कए परोसल जाइत अछि . एकरा रचनिहारलोकनि एकर नाम देलनि अछि - 'चरिपतिया '. दोहा-गजल जननिहारलोकनिक हिसाबें ई दोहा-शेरक अशुद्ध रूप अछि , जाॅहिमे रदीफ- काफिया उपस्थित रहैछ .

आइ जखन मैथिलीकेॅ पाठकवर्ग सिमटि रहल अछि . मैथिली पोथी नै बिका रहल छै . युवावर्ग मैथिलीसॅ अपरिचित भऽ रहल छै .मैथिल लोक द्वारा मैथिली पढ़बाक -लिखबाक नै , खाली बजबाक  भाषा रूपमे चिन्हल-बुझल जाइत अछि , एहन दुरूह समयमे हमरा हिसाबें चरिपतिया , सामान्य मैथिलजनकेॅ मैथिलीसॅ जोड़बाक नीक प्रयास अछि .आ हम एहन प्रयासकेॅ स्वागत कऽ रहल छी . आब ओ समय आबि गेलैक येॅ जे मैथिलीकेॅ आमजन तक पहुॅचायल जाय.

विद्वानलोकनि भले जे कहैथ , चरिपतियाकेॅ साहित्यिक विधा मानैथ वा नहि किंतु एकर प्रसिद्धि जरूरे हुनका अपना दिस आकर्षित करतनि . चारि दिन पहिने एहि प्रयोगधर्मी विधाक विशेषज्ञ विभूति आनंद जीसॅ पूछने छलौं चरिपतिया लेखनक संबंधमे . जकर उत्तर दैत ओ कहने छलैथ जे हुनका लेल चरिपतिया एकटा एहन अभिव्यक्तिक साधन छनि जाहिसॅ ओ अपन व्यक्तिगत पीड़ा बिसरबाक प्रयास करैत छथि आ हुनके अनुसारे कखनो-काल छोड़ि , ओ एहिमे सफल सेहो छैथ .  उत्तर दैत हुनका एहि बातक खुशी छल जे एहि लेखनमे फेसबुकपर युवावर्ग द्वारा खूबे सहयोग भेंटैत रहलनि .

एखन फेसबुकपर विभुति आनंद जीकेॅ अतिरिक्त अशोक मेहता , वियोगीजी ,अमित मिश्र ,अमित पाठक ,नारायण झा , चंदन कुमार झा , मनोज शांडिल्य ,विजय शंकर झा , राजीव कुमार , रूपेश त्योंथ , धनश्याम झा आ अक्षय आनंद सन्नी खूबे चरिपतिया लिख रहल छथि .

जौं हमर मानू तॅ एहि सार्टकट आ भागम-भागक जिनगीमे जतऽ लोक अपनेमे ओझरायल रहैत अछि , चरिपतिया कम समय आ कमे शब्दमे अभिव्यक्तिक सशक्त माध्यम अछि . खैर चरिपतिया पर विस्तारसॅ बादमे  लिखब  . एखन लगभग 150 चरिपतिया लिखनिहार विभुति आनंद जीकेॅ किछु चरिपतिया अहूॅ पढ़ू , साझा कऽ रहल छी - बालमुकुंद पाठक .
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1.

 कानि-कानि कऽ जीयब होइ छै,
सभ सौं कठिन परीक्षा
हम कानब कें हंसि कऽ जीयब,
कयलहुं अछि से इच्छा


2.

भोर चलल दूपहर धरि
समय गेल छल धीप
तें चौरा लग कांपि रहल
ओक्कर मोनक दीप


3.

राजनीति केर घाट पर
सैह रहल अगराय
खूनक होली खेलि कऽ
मांसु-भात जे खाय


4.

 नैतिकता जी मूक छथि,
बहिर हुनक छनि कान
तें तऽ छल-प्रपंच जी,
चिबा रहल छथि पान



5.

 साग चना केर, मरुआ रोटी
आ दुधुआ केर याद
माय केहन तों जिह्वा हम्मर
ओहन न भेटल स्वाद !


6.  

मायक आंखि अछि अगम-अथाह_
हम डूमल जतबा बेर
सत-सत बाजी, भोगल अछि हम_
तीरथ सौ - सौ बेर


7. 

वासंती परिधान में , हम
देखल पूनम आइ
झकझक राति इजोर के
राहु गरसने जाइ .


8.

शब्द-शब्द मे जहर भरल,
कटल-फटल मन-भाव
जीह-ठोर सभ खूने सानल,
टभकल , टीसल घाव


9.

जाड-ठार हम काटि लेबै
नार-पोआरक संग
नै सोचियौ जे हारि जेबै
मौसम केर ई जंग


10.

चालि-चलन ओ बात-विचारें
बदलल, बगदल गाम
जाहि भूमि पर जन्म लेल अहं
रहल न से ओ ठाम


11.


वैह हवा छल, वैह पानि छल
वैह सकल रस-रंग
वैह चिरैया, चुनमुन-चुनमुन
रहल उडौने चंग

12.

गामक गति-मति,गामक सुधि-बुधि,
गामक ओ व्यापकता
बदलि गेल सभ रूप - रंग , पर
बदलल नै आपकता.




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