Sunday, February 22, 2015

प्रस्तुत अछि 'संङोर'क ट्रेलर

नेपाली मैथिली साहित्यमे उपन्यास बहुत कम वा भरिसकेॅ लिखल जाइत अछि . एहन समयमे रमेश रंजनक उपन्यास आएल अछि 'संङोर' ।  रेडियो नाट्य श्रृंखला संङोरक पुस्तक रूप कयल एहि पोथीकेॅ प्रकाशित केलक अछि फाइनप्रिंट आइएनसी ।नेपालक बदलैत परिस्थिति आ मधेशमे बढ़ैत हिंसात्मक गतिविधिक पृष्ठभूमि पर लिखल  एहि पोथीक किछु अंश प्रस्तुत अछि ।पढ़ू आ बताउॅ - माॅडरेटर
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कोनो काॅलेजमे नया सेशनक शुरूआतमे गजबके रौनक रहै छै । हाइस्कूलसॅ छरपान मारिकऽ काॅलेज पहुॅचल छात्र -छात्राके काॅलेजमे बिनु परिचये चिन्हल जा  सकैए । ओकर चालि -ढालि , रंग -रूप आ स्वभाव परिचय दैत रहै छै ।बदलैत उमेरक प्रभावसॅ परिवर्तन होइते छै , ओहि परिवर्तनके सहेजि नै पओलासॅ छलकैत रहै छै । से नया सेशनक शुरूआत संगे काॅलेजक कमपाउन्ड ,ऑफिस , पुस्तकालय आ क्यान्टिन सभके सभ अति व्यस्त देखाइ दऽ रहल छै । ओइ जगहसभमे नव विद्यार्थी गज- गज कऽ रहल छै ।कतेको गाम , टोल आ बस्तीसॅ युवासभ अपन भविष्यके स्वर्णिम बनएबालए उच्च शिक्षा ग्रहण करऽ आएल अछि ।ओहिना अपन भविष्यके तलाशैत अमित सेहो आएल अछि ।

'आइडी कार्ड कतऽ बनै छै ? काॅलेजक कम्पाउन्डमे बैसल जटाधर आ भोलासॅ पुछने छलै अमित ।
'आइडी कार्ड की करबे ?'
'परिचयक लेल तॅ चाही ने ।'
'किए , तोरा नइ कियो चिन्है हउ से ?'
'कार्डक तॅ आउरो बहुत काम होइ हइ ने ।'


जटाधर आ अमितक बीच भऽ रहल बातचीत एकटा बतंगर छलै ।अमितके बुझेलै जे जटाधरसॅ बात करब ठीक नइ । तइपरसॅ भोलाक टिभकारी ओकरा आओर बेजाए लागल रहै ।अमित ओतऽ सॅ ससरिकऽ आगू बढि गेल । मुदा ओकरा दिमागमे इएह नचैत रहलै 'जटाधर एना किए बाजल ? ककरोसॅ कियो किछु पुछै छै , लोकके जे बुझल रहल से जबाबो दै छै । हम पुछिए देलियै तॅ कोन अन्याय केलियै !' अमित मोनमे घुरिया रहल छलै ई बात । ओ बढ़ैत गेल आ एकान्तसन जगहपर जा कऽ बैसि रहल । देबालपर बैसिकऽ ओ टांग झुला रहल छल । मुदा एखनो जटाधरक बात घुमड़ि रहल छलै ।


'धत केहन-केहन लोक होइ छै ! ओ कहि सकै छल हमरा नइ अछि बूझल । हमरा तकलीफ नइ होइतए ।एखन तकलीफ अछि । हमरा तकलीफ दऽ कऽ ओकरा कथी भेटलै , पता नइ ' !
आब अमित जकाॅ सोचनिहार लोकके अइ काॅलेजमे कोन काज ! अइठाम तॅ पढू ने तॅ गुण्डागर्दी करू , अही दू धारमे बॅटाइत अछि ।ई अलग बात छै जे एखन काॅलेजसभमे दोसर धारक विद्यार्थीक संख्या खूबे बढि रहल छै । आब गुण्डागर्दीक बजार -भाव बढि गेलाक बाद ओकर उत्पादनक हेतु सेहो जगह चाही । आ से काॅलेजसॅ नीक आओर की भऽ सकै छै ! तैयो अमित अपनेमे गुनधुन करैत देबालपर एसगरे बैसल टांग झुला रहल छल  । एहन लड़कासभसॅ दूरे रहबाक कोनो उपायक खोजमे छल अमित ।खोजत किए ने ? जे बाल्यावस्थेमे  बपटुग्गर होएबाक पीड़ा भोगने हुए ।वृर्द्ध आ कमजोर माएक ऑखिमे आशाक चमकके अनुभव कएने हुए । धीरे-धीरे बढ़ल जाइत बहिनक जिम्मेवारीक बोध जकरा भऽ गेल होइक । जकरा गरीबी ,अभाव , मेहनतिसॅ लगक सम्बन्ध बनि गेल होइक ओ काॅलेजमे आबिकऽ करत की ? पढ़ाइ !


से बड़ी कालसॅ गुमसुम बैसल अमितके देखि रहल छलै हिना आ अनुपमा । अमितसॅ कोनो खास परिचय तॅ नइ छलै मुदा बसक आबाजाहीमे देखासुनी भऽ गेल छलै । अनुपमा थोड़े जिज्ञासु होइत बाजल , 'हिना ,ओ असगरे एकान्तमे किए बैसल छै ?'
'से हम की जाने गेलियै ?'
'नइ ,तइयो ?'
'पुछही ने , हे महादेव अपने तपस्यामे किए लीन छी ? बताओल जाओ ।'
कने खिसियाइत बाजल अनुपमा , तोहर आदति बड़ खराब छौ हिना ।एना कतौ लोक बजलैए ?
'अएॅ गे ।अइ काॅलेजमे हजारो विद्यार्थी छै । आब के कतऽ बैसल छै , के कतऽ की करै छै , अइसॅ मतलब राखऽ लगलें , तखन तॅ पढाइ केलें आ कि किछु बाॅकी छौ ।'
हिनाक जबाब अनुपमाके निरूत्तर कऽ देलकै । मुदा अनुपमाक मनक जिज्ञासा समाप्त नइ कऽ सकलै । ओ हिनासॅ सम्बोधित होइत बाजल, चल तॅ देखियै ।'
'गे ,तोरा किछु भऽ गेलौए ?'
'नइ तॅ ।'
'तऽ ओकरा पाछू किए पड़ि गेलहीं तू ?
'हिना तों जेबे कि नइ से कह ?'
'चल बौआ ,चल , जतऽ-जतऽ रातो , ततऽ-ततऽ बिगही ।'


हिना एकटा नम्हर साॅस छोड़लक  । अनुपमा घिचने लऽ जा रहल छलै हिनाके अमितदिस । ई कोनो प्रेमपूर्ण गुदगुदी आ कि एकटा सहज जिज्ञासा छलै जे अनुपमा अमितक बिषयमे किछु बुझऽ चाहै छल आ कि ओकरा मे एक प्रकारक आकर्षण छलै जे अनुपमाके घिचि रहल छलै ? अनुपमा हिनाक आंगुर धेने अमितदिस बढल जा रहल छल । हिनाक आंगुरपर दबाब किछु बेसिए बढि रहल छलै । हिना एकबेर नजरि उठाकऽ देखलक अनुपमादिस आ मन्द मुस्की छोड़लक । अनुपमा देखै छै हिनाके मुस्कयाइत मुदा बुझै इएह जे एकर आदति छै मजाक करैत रहबाक । दुनू गोटे आगू बढ़ैत जा रहल अछि , हिना अनुपमाक आवेशक अनुभव करैए । अपना आंगुरपर बढ़ैत जाइत दबावक कारणसॅ ।

'गे ,आबो तॅ छोड़ि दे , बुझाइए जेना आंगुरे उनारि देलक ।' हिनाक मुहसॅ ई बात सुनैत अनुपमा भक्क दऽ अंगुरी छोड़ि दै छै । हिना अपन अंगुरीके फुकैत बजैए , 'तोहर संगत नइ छोड़लहुॅ तॅ हमरा लुल्ह- नाङर बना देबे ।'
'हइ चुप्प ,नइ तॅ मारबौ ।'
नोंक-झोंक करैत ई दुनू पहुॅचि गेल छल ओहिठाम । अमित एखनो एकान्त साधकजकाॅ अपनहिसॅ बतिया रहल छल । अमितक ध्यान भंग भेलै हिनाक स्वरसॅ , की पुछऽ के छौ ,पुछहीं ?' अमित घुरैत अछि दुनूदिस ।
'अहाॅक घर दुर्गौली अछि  ने ?'
'हॅ ,मुदा अहाॅ कोना बुझलियै ?'
'क्लासमे अहाॅ परिचय देने रहियै ने ।'
'आ अहाॅ सभक घर ? अमित थोड़े खखाइत बाजल । हिना फटाकसॅ जवाब देलकै ,हनुमाननगर ।'


दू गोट नवयौवना आ एक गोट नवयुवकक मित्रताक पहिल अध्याय चलि रहल छलै । माने अहाॅ कोन बिषय पढ़ैत छी ? किए पढ़ै छी ? कोना काॅलेज आबाजाही करैत छी ? यावत प्रश्न एक- दोसरसॅ होइत रहलै , दुनू थोड़े -थोड़े खुलैत गेल जे कि आम मैथिलक स्वभाव होइ छै  । ककरोसॅ वार्ता प्रारंभ होइते सांगोपांग जानकारी लेबऽ चाहैत अछि । से दुनू जतेक सम्भव होइ छै , तते एक- दोसराक विषयमे जनतब लऽ रहल अछि । जेना बापक नाम की अछि ? बाबा की करैत छलाह ? कोन बससॅ अबै-जाइ छी ? कण्डक्टर , ड्राइभर चिन्हल अछि कि नइ , आदि । से ओहि क्रममे अमितके ई बुझबामे भांङठ नइ रहलै जे हम अपन मोनक बात कतौ बाजि सकै छी , अर्थात जटाधर जे बिन बातक बातमे बेइज्जत कऽ देने छलै से चाहै छल निकालि बाहर फेकी । ओ उपयुक्त स्थान आब भेंटि गेल छलै । 'सैह कहूॅ तॅ अनुपमाजी , हम गेलियै आइडी कार्ड कतऽ बनै छै से बुझऽ आ ओ बुझू जे हमरा धो कऽ धऽ देलक ।' हिनाके अमितक सोझपनीपर हॅसी निकलि गेल छलै , ओ बाजल धो देलक तॅ नीके केलक ने , जतेक मैल बैसल छल से सब निकालि देलक ।' 'अहूॅ बड़ मजाकिया छी ।' अमितक ई बात समाप्तो नइ भेल छलै कि अनुपमा बड़ी बिटिया कऽ बाजल , 'एकरा बात बनाबऽ के सिवाय किछु अबिते नइ छै ।'


ई संभव नइ छैक जे कियो हिनाक मजाकक घेरामे अबै आ हिना ओकरा छोड़ि दै तॅ फेर हिना की ? से अनुपमाक बातक बाद तुरत हाजिरजबाबी हिना बाजल , 'बात बनाओल नइ जाइ छै , बात बाजल जाइ छै ।' सभक मुहसॅ अनायासे ठहक्का फुटि पड़लै । तीनू डोरिया रहल छल क्यान्टिनदिस । मुदा तखने धण्टी लगै छै । अमित धण्टीसंगे चौंकैत अछि , 'हमरा तॅ बुझाएल छल लिजर छै , मुदा क्लास छै । चलू ।'

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