Thursday, January 29, 2015

दीप नारायण विद्यार्थीक किछु गजल






मैथिली मे एम्हर सभसँ  बेसी किछु रचल जा रहल अछि, त' ओ अछि गजल. हालहिं  युवा रचनाकार दीप नारायण विद्यार्थीक एकटा  गजल संग्रह बहरायल  अछि - "जे कहि नञि सकलहुॅ " . ई संग्रह  मैथिली साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समिति , मधुबनी द्वारा प्रकाशित भेल अछि । एम्हर किछु दिनसँ  यैह  गजल संग्रह पढ़ि रहल छी. बहुत सहज आ सरल भाषा मे विद्यार्थी जी समाजक अनेकानेक समस्या पर चिंतन करैत अपन बात गजलक मादे कहलनि अछि ।पोथीसँ  किछु  गजल प्रस्तुत कऽ रहल छी, अहूँ पढू  - माॅडरेटर

1.

हुनका लेल हम आन छलहुॅ
हम कतेक अनजान छलहुॅ

जाहि घरकेॅ अपन बुझलहुॅ
ओहि घरमे मेहमान छलहुॅ

हम साॅचकेॅ साॅच कहलियनि
हम कतेक बिरवान छलहुॅ

हम हुनक छी जानके दुश्मन
जनिकर कहियो जान छलहुॅ

देखने रहियनि एहि आॅखिमे
हम पूर्णमासिक चान छलहुॅ

2.

देखियौनि राति राति भरि बौआइत अछि
बतहा चान हमरे जकाॅ बुझाइत अछि

हृदयक सिलेट पर लिखबासॅ पहिने
कनेक सोचियौ कहियो नै मेटाइत अछि

भैयारी इहो एकटा पैघ बुझव्वैल छैक
ओ अपन नञि जे अपन बुझाइत अछि

खुशी द'क' ओ हमरा हॅसय नञि देलक
खाली एतबेटा बात नञि धोंटाइत अछि

एहि रिश्ता-नातासॅ मन भरि गेल दीपक
नञि जानि तैयो किएक कनाइत अछि

3.

की-की नञि हमरा करेलक ई जिनगी
अॅगुरी पर खाली नचेलक ई जिनगी

भूखसॅ पियाससॅ कखनो कोनो बातसॅ
बेर-बेर हमरा कनेलक ई जिनगी

नीक ले' बेजाय ले' यौ कनी -मनी पाइ ले'
अपनोकेॅ दुश्मन बनेलक ई जिनगी

सर कुटुमैतीसॅ अपन अपनैतीसॅ
की-की ने उलहन सुनेलक ई जिनगी

नीक आ बेजाय केलहुॅ सभक ले'केलहुॅ
एसगरे किएक कनेलक ई जिनगी

की कहूॅ अपन हृदय केर व्यथा हम
अपनहि घरसॅ भगेलक ई जिनगी

पढि नै पेलौं 'दीपक' जिनगीक किताब
कोन भाषा हमरा पढेलक ई जिनगी

4.

क्षोभ भेल व्यवहारसॅ
अपनहिॅ रिश्तेदारसॅ

बड्ड बेसी आस छल तें
टूटि गेलौं परिवारसॅ

अनचिन्हारक की कहूॅ
सभसॅ बेसी चिन्हारसॅ

मन करै हम्मर मीता
उठि जाइ ऐ संसारसॅ

घर आॅगन बॅटि गेल
बूझि परैए पथारसॅ

दुश्मनी दीपकसॅ आब
अछि मित्रत्रा अन्हारसॅ

5.

दाता आर भिखारी के छथि
जिनगीक मदारी के छथि

कण -कणमे ओ छथिन तॅ
पाखण्डी आ पूजारी के छथि

ककर प्रतापे सांस चलै
सांसक रखवारी के छथि

सभक अपन बेर छन्हि
के पाछाॅ आ अगारी के छथि

भाइ सभ हुनके संतान
ब्राह्मण आ अंसारी के छथि

रचनाकार संपर्क:
दीप नारायण विद्यार्थी
ई मेल : deepnarayanvidyarthi4@gmail.com
मो. 09430583847

2 comments:

  1. सूरज को अपना प्रकाश और कवि को अपनी लेखनी का प्रमाण नहीं देना पड़ता, यह स्वयम् सिद्ध है।

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